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योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक है, PM मोदी ने भारी जनादेश का गलत मतलब निकाला, लोकतंत्र की जड़ में दीमक लग चुकी है।

अगर योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाना जनमत का सही आकलन नहीं है तो हम गंभीर संकट में है, इससे लोकतंत्र की सीमाएं उजागर होती है। इससे पता चलता है कि ये केवल खंडहर बन कर रह गया है।

नई दिल्ली, 20 मार्च: गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ यूपी के नए सीएम बन गए है। लेकिन, योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना एक घृणित और अमंगलसूचक कदम है। घृणित इसलिए कह सकते है क्योंकि, बीजेपी ने एक ऐसे व्यक्ति को सीएम चुना है जिसे यूपी की राजनीति में व्यापक तौर पर विभाजनकारी, गाली-गलौज करने वाले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले शख्सियत के तौर पर जाना जाता है। वो एक ऐसे नेता हैं जिन्हें अपने राजनीतिक जीवन में उग्र हिंदू सांप्रदायिकता, प्रतिक्रियावादी विचारों और राजनीतिक विमर्शों में नियमित टकराव और ठगी का चेहरा माना जाता रहा है।

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अमंगलकारी इसलिए है क्योंकि इससे सीधा संकेत गया है कि यूपी और अन्यत्र जगहों पर पहले से ही हाशिए पर रह रहे अल्पसंख्यकों को अब सांस्कृतिक, सामाजिक और प्रतीकात्मक समर्पण की तरफ बढ़ाया जाएगा। इसका सीधा संकेत है कि बीजेपी अब अतिवाद से प्रभुत्व कायम करेगी। उसकी राजनीति आशा के बजाय विद्वेष, बहुलता के बजाय सामूहिक अहमन्यता,  मेल-मिलाप के बजाय नफरत और सौम्यता के बजाय हिंसा से अपना वर्चस्व कायम करेगी। यूपी में प्रचंड बहुमत से जीत मिलने के बाद बीजेपी का घमंड अब जड़ जमा चुका है। उसे लगता है कि वो चाहे जो कर सकती है और अब वह अपने मंसूबे पूरा करना चाहती है।

यूपी की जनता ने बीजेपी को अभूतपूर्व बहुमत दिया लेकिन, ये सच है कि हमारे जैसे बहुत से लोग जिन्होंने ऐसे नतीजों का अनुमान नहीं किया था वो समझ नहीं पा रहे हैं कि ये बहुमत किस चीज का प्रतिनिधत्व करता है। हम इतना ही जानते हैं कि आम जनता ने मोदी पर उनके प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले बहुत ज्यादा भरोसा किया है। उन्हें आगे बढ़कर नेतृत्व करने का श्रेय मिला है। लेकिन उन्होंने इस जनमत का ये मतलब निकाला कि उनकी पार्टी को अपने सबसे कुत्सित मंसूबे पूरा करने का अधिकार और लाइसेंस मिल गया है। आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री के रूप में चयन केवल यूपी के लिए संदेश नहीं है, बल्कि ये संदेश है प्रधानमंत्री के झुकाव और फैसले का।

उन्होंने अपने राजनीतिक विजय के क्षण में भारत को पराजित करने का फैसला लिया। बीजेपी के समर्थक इस चयन के बचाव के लिए पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे छिप रहे हैं। हाँ, ये सच है कि आदित्यनाथ के चयन के पीछे विधायक दल की सहमति की औपचारिक मुहर है। पीएम मोदी की शक्ति को देखते हुए ये तर्क गले नहीं उतरता। अगर आदित्यनाथ इतने ही लोकप्रिय विकल्प थेे तो चुनाव से पहले उन्हें सीएम उम्मीदवार क्यों नहीं घोषित किया गया? अगर सीएम कैंडिडेट के तौर पर योगी आदित्यनाथ पूरे प्रदेश में स्वीकार्य थे तो बहुमत मिलने से वो स्वीकार्य नहीं हो जाते। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ये एक तरह से दोमुंहापन है। एक तरह का इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री के भाषणों और बीजेपी के घोषणापत्र में उसकी वैचारिक तरंगे साफ दिख रही थीं।

आदित्यनाथ के चयन को जायज ठहराने वाला कोई भी तर्क इस देश को बीमार बनाएगा। अगर इस जनमत का यही मतलब है कि विधायकों ने आदित्यनाथ को चुना है तो समझ लीजिए की भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद में दीमक लग चुकी है। यानी ये कहा जा सकता है कि भारत इस कदर सांप्रदायिक हो चुका है कि आदित्यनाथ जैसा सांप्रदायिक व्यक्ति लोकप्रिय चयन है।

(ये लेख इंडियन एक्सप्रेस अखबार में ‘योगिक मैडनेस’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। लेखक सीपीआर दिल्ली के प्रेसिडेंट और इंडियन एक्सप्रेस के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं।)

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