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नोट बंदी : अधूरी तैयारी, अधूरा ख्वाब – उर्मिलेश।

अब कुछ लोग कह रहे हैं कि विपक्ष जनता को नोटबंदी के बारे में भ्रमित कर रहा है। वह जनता के हक में की गई है। अगर उसके हक में की गई है तो सिर्फ वहीं इसका दुष्परिणाम झेलने को क्यों अभिशप्त है?

नई दिल्ली : 23 नवम्बर : भारत में कालेधन, भ्रष्टाचार और आतंकी-फंडिंग पर निर्णायक अंकुश लगे, यह वे सभी लोग चाहेंगे, जो स्वयं कालाधन-धारी नहीं, जो भ्रष्टाचारी नहीं या जो आतंकी नहीं! कौन नहीं जानता कि कालेधन का बड़ा हिस्सा हमारे यहां कारपोरेट, व्यापारी, नेता या अन्य बड़े धंधेबाजों के एक हिस्से के पास है। देश की ज्यादातर पार्टियां, खासकर बड़ी पार्टियां सैकड़ों-हजार करोड़ रूपये के चुनाव फंड से अपनी राजनीतिक तैयारी शुरू करती हैं। ज्यादा साफ-साफ जानना हो कि पिछले चुनाव में किसको कितना मिला या किसने कितने खर्च किये तो आप ADR या फिर चुनाव आयोग की वेबसाइट देख लें। मतलब साफ है कि सभी प्रमुख पार्टियों के पास कालाधन आता है। चुनाव सुधार नहीं होने से उन्हें कालाधन काले-तरीके से लेने की छूट मिली हुई है।

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अब कुछ लोग कह रहे हैं कि विपक्ष जनता को नोटबंदी के बारे में भ्रमित कर रहा है। वह जनता के हक में की गई है। अगर उसके हक में की गई है तो सिर्फ वहीं इसका दुष्परिणाम झेलने को क्यों अभिशप्त है? लाइनों में आम लोग ही क्यों हैं, खास लोग क्यों नहीं?, शादियों के लिये सरकार और बैंकों की ‘इजाजत’ और ‘दया’ सिर्फ आम लोगों को क्यों लेनी पड़ रही है, खास लोगों को क्यों नहीं? सड़क, बैंकों की लाइन या अस्पतालों में आम लोग ही क्यों मर रहे हैं?

अगर भारत में समूचे कालेधन का सिर्फ 6 फीसदी हिस्सा ही ‘कैश’ में है तो इसके लिये नोटबंंदी जैसा फैसला क्यों, जिसके चलते देशवासी (खास लोगों को छोड़कर) इस कदर परेशान हैं? सोना, रियल एस्टेट, हवाला और अन्य जरिये से कालाधन रखने वालों पर क्या कोई कार्रवाई हो रही है? ‘मगरमच्छों’ को अभयदान और कुछ ‘मछलियों’ को पकड़ने की यह बहादुरी क्यों? सिर्फ 6 फीसदी संदिग्ध ‘कैश’ के लिये ‘राष्ट्रवादी सरकार’ ने 86 फीसदी करेंसी बंद कर दी। लेकिन 94 फीसदी कालेधन के भंडारों पर अभी तक खामोश है। ऐसा क्यों महराज? अभी कुछ ही दिन पहले ‘माल्या साहब’ सहित 63 बड़े उद्योगपतियों के 7000 करोड़ से ज्यादा के बैंक-कर्ज को राइट-आफ किया? वह क्यों किया महराज? इसके पहले उद्योगपतियों का 650000 करोड़ रूपये का बैंक-कर्ज राइट-आफ किया गया था।

अभी फिर दो पसंदीदा उद्योगपतियों को एक बड़ा सरकारी बैंक करोड़ों का कर्ज देने जा रहा है। मान लिया इस नोटबंदी से कुछ रिश्वतखोर इंजीनियर, अफसर, नेता या अन्य लोग(जो अपने ‘काले’ को ‘सफेद’ बनाने के मामले में समझदार नहीं निकले!) गिरफ्त में आ सकते हैं। जिन पर शासन की पहले से नजर होगी, वे तो निश्चय ही नपेंगे! पर कालेधन के विशाल भंडार में यह कितना बड़ा हिस्सा होगा? फिर यह कैसे सुनिश्चित होगा कि आपके इन कदमों से भविष्य़ में कालेधन के सारे स्रोत खत्म हो जायेगे! वैसे भी अब तो 2000 के नोट भी जारी हो गये। कुछ सहूलियत ही हुई है! ठोस और दूरगामी असर वाले कदमों के बजाय आनन-फानन में फरमान सुना दिया गया, वह भी तैयारी और ठोस वैकल्पिक इंतजाम किये बगैर।

बार-बार अपने फैसले में सरकार संशोधन कर रही है। अब किसानों(मैं स्वयं एक (दिवंगत)गरीब किसान का बेटा हूं) के लिये 500 और 1000 रूपये के बंद किये गये नोटों को सरकार ने वैध करने का फैसला किया। मजदूरों के लिये ऐसा फैसला नहीं, बुनकरों के लिेये नहीं, कैंसर या इस तरह की खतरनाक जानलेवा बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिये क्यों नहीं? दलित-आदिवासियों के लिये क्यों नहीं? वजह तो बताओ भाई? शायद इसलिये कि फैसला लेने वालों को कुछ देर बाद लगा कि यूपी-पंजाब में किसान ज्यादा नाराज हुए तो वोटों के लाले पड़े जायेंगे! कैसा निजाम है कि बेईमानों और भ्रष्टों के लिए तो कोई समस्या नहीं, पर एक साधारण आदमी गंभीर रूप से बीमार पड़ जाय और उसके पास प्लास्टिक मनी(डेबिट-क्रेडिट कार्ड आदि) नहीं तो वह अस्पताल में पैसे के अभाव में मर जायेगा! बैंक में दो लाख हो तो भी वह तयशुदा रकम से ज्यादा नहीं निकाल पायेगा। वह भी तब जब बैंक या एटीएम के काउंटर तक वह पहुंच जाये। क्या यह संविधान और जनतंत्र का माखौल नहीं है?

सच बात तो ये है कि विपक्ष इस मामले में जनता के बीच जरूरी जनजागरण नहीं कर पा रहा है! वह संघ-प्रशिक्षत कार्यकर्ताओं की तरह न तो संगठित है और न ही अफवाह-बाज है! वह विभाजित और संकीर्ण स्वार्थों में डूबा भी है। यही कारण है कि ऐसे नाजायज फैसले को इतने बुरे, भौंड़े और असंवैधानिक ढंग से जबरन लागू करने की सरकारी जिद्द् का वैसा प्रतिरोध नहीं हो रहा है, जैसा होना चाहिये था! विपक्ष नेतृत्व विहीन नजर आ रहा है और सत्ता-पक्ष निरंकुश और खतरनाक हदों की तरफ बढ़ रहा है!

फेसबुक से साभार : उर्मिलेश एक स्वतंत्र पत्रकार है। लेख में उनके विचार निजी है। 

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