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समय के बढ़ते दबाव और भारतीय परिवार।

NewsToIndia :दरअसल, भारतीय परिवार ही भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत है और वही उसकी सबसे बड़ी सीमा भी। भारत ऊपर-ऊपर से बहुत बदला है और तेजी से बदलता जा रहा है। पर यह उन बुनियादी चीजों से  अधिक नहीं बदल पा रहा है जिन पर इस राष्ट्र का पूरा का पूरा भविष्य टिका हुआ है। आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीय जनता जो राजनीतिकरण शुरू हुआ था, लोकतंत्र के पौन सदी के अभ्यास ने उस राजनीतिकरण को और बढ़ाया है। भारतीय जनमानस और राजनीतिक हुआ है। यह बेशक अच्छी बात है। क्योंकि इसे देश “कोऊ नृप होय हमें का हानि ” की मानसिकता सदियों तक बहुत प्रभावी रही है और देश के चौतरफा पतन का कारण भी रही है। मगर चिंता की एक बात है। वह यह की जनता की बढ़ती राजनीतिक सजकता दिशाहीन है। मूल्यविहीन भी है। क्योंकि यह सिर्फ सत्ता की राजनीती से जुडी हुई है।

भारतीय लोकतंत्र के सतत अभ्यास ने सत्ता की राजनीती को मजबूत  किया है। समाज परिवर्तन की राजनीति कमजोर हुई है। हालाँकि बहुत तरह की आर्थिक दवाबों, बदलती तकनीक के आदि के चलते समाज भी कुछ बदला है। पर यह बदलाव पर्याप्त नहीं है। सही दिशा में भी नहीं है। परिवार समाज की बुनियाद है और इसमें बहुत बदलाब नहीं आ सका है। वह जिन आधारों पर सदियों से टिका रहा है, उन्ही आधारों पर वह आज भी है। जहाँ कहीं ये आधार बदले है, वहां भी एक खास तरह की अवसरवादिता ने जगह बनाई है। भारत के भविष्य का सामना सीधे-सीधे इस बात से है की व्यक्ति बदले, परिवार बदले, समाज बदले और ये सभी मिलकर देश की राजनीती की सोच बदल दें। देश की राजनीतिक जागरूकता को, मतदान के अधिकार को, लोकतंत्र की सफलता को बढ़ाना और घनीभूत होना चाहिए। मगर उसे कम  से कम अब तो अपनी दिशा अपने स्वरूप के बारे में सोचना चाहिए।

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यानी कुल मिलाकर कहानी यह है की पांच -छह हजार साल पुराना यह देश अपनी जिस चिरंतनता में निश्चिंत था , उसमें इसकी आने वाली पीढियां निश्चिंत नहीं रह पायेगी। यदि भारत का व्यक्ति न बदला और समाज का गठन न बदला तो इतिहास उसे तोड़ देगा। क्योंकि किसी भी गुजरी सदी की तुलना में अब  भारतीय परिवार जो दबाब है वह दिनोदिन बढ़ने वाला है, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक, आर्थिक….. हर रूप में। शुतुरमुर्ग अब अपने ही पंखों में छिपकर सुरक्षित नहीं रह सकता है।

आलोक श्रीवास्तव (email: alok.srivastava@dbcorp.in)

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